السبت ١٩ كانون الأول (ديسمبر) ٢٠٢٠
بقلم رندة زريق صباغ

قراءة في المجنون والبحر مسرحة القصيدة العربية

قراءة‌ ‌في‌ ‌المجنون‌ ‌والبحر‌ ‌مسرحة‌ ‌القصيدة‌ ‌العربية‌ ‌للشاعر‌ ‌الأديب:‌ ‌وهيب‌ ‌نديم‌ ‌وهبة‌ ‌

هل‌ ‌هي‌ ‌قصيدة‌ ‌تمسرحت؟‌ ‌لان‌ ‌مجنونها‌ ‌رفض‌ ‌إلا‌ ‌أن‌ ‌ينقل‌ ‌الحياة‌ ‌إلى‌ ‌المسرح‌ ‌لأنه‌ ‌وبجنونه‌ ‌"العبقري"‌ ‌يرى‌ ‌الحياة‌ ‌كلها‌ ‌مسرحًا‌ ‌كبيرًا‌ ‌نلعب‌ ‌نحن‌ ‌عليه‌ ‌أدوارنا‌ ‌–‌ ‌فتمسرح‌ ‌بها.‌ ‌

إذا‌ ‌تساءلتم‌ ‌لماذا‌ ‌المجنون؟‌ ‌فلأن‌ ‌مابين‌ ‌الجنون‌ ‌والعبقرية‌ ‌شعرة،‌ ‌هذه‌ ‌الشعرة‌ ‌قد‌ ‌تكبر‌ ‌أحيانًا،‌ ‌فتجعل‌ ‌الفرق‌ ‌بين‌ ‌الاثنين‌ ‌شاسعًا.‌ ‌ولكنها‌ ‌في‌ ‌معظم‌ ‌الأحوال،‌ ‌سرعان‌ ‌ما‌ ‌تتلاشى‌ ‌فلا‌ ‌نعود‌ ‌نميز‌ ‌بين‌ ‌المجنون‌ ‌والعبقري.‌ ‌

ومن‌ ‌هنا‌ ‌فان‌ ‌كثيرًا‌ ‌من‌ ‌عباقرة‌ ‌الحياة‌ ‌يفضلون‌ ‌أن‌ ‌ينعتوا‌ ‌أنفسهم‌ ‌قبل‌ ‌أن‌ ‌ينعتهم‌ ‌الآخرون‌ ‌بالمجانين.‌ ‌
أما‌ ‌لماذا‌ ‌البحر؟‌ ‌فهذا‌ ‌ما‌ ‌أنصحكم‌ ‌باستنتاجه‌ ‌بعد‌ ‌قراءة‌ ‌هذه‌ ‌الإبداعية‌ ‌الرائعة‌ ‌حيث‌ ‌من‌ ‌الممكن‌ ‌أن‌ ‌يختلف‌ ‌التفسير‌ ‌من‌ ‌شخص‌ ‌لأخر،‌ ‌وهنا‌ ‌تكمن‌ ‌العظمة،‌ ‌كما‌ ‌هو‌ ‌الحال‌ ‌مع‌ ‌الرسم‌ ‌التشكيلي،‌ ‌الذي‌ ‌قد‌ ‌نفهمه‌ ‌تمامًا‌ ‌كل‌ ‌بطريقته‌ ‌طبعا‌ ‌-‌ ‌وقد‌ ‌لا‌ ‌نفهم‌ ‌منه‌ ‌أي‌ ‌شيء.‌ ‌

البطل‌ ‌الثالث‌ ‌هو‌ ‌هالة..‌ ‌المحبوبة‌ ‌-‌ ‌رمز‌ ‌كل‌ ‌ما‌ ‌هو‌ ‌نظيف‌ ‌وجميل‌ ‌في‌ ‌هذه‌ ‌الحياة،‌ ‌وصفها‌ ‌باليمامة‌ ‌والاهم‌ ‌من‌ ‌ذلك‌ ‌إنها‌ ‌رمز‌ ‌الأمل‌ ‌والتفاؤل.‌ ‌

فهالة‌ ‌هي‌ ‌النور‌ ‌الذي‌ ‌يحيط‌ ‌بالقمر‌ ‌فيزيد‌ ‌جمالًا‌ ‌وروعة.‌ ‌

"تستيقظُ‌ ‌على‌ ‌شطآنِ‌ ‌الْفرحِ‌ ‌مثلَ‌ ‌يمامةٍ،‌ ‌وأخافُ‌ ‌على‌ ‌الْيمامِ‌ ‌الْهاربِ‌ ‌منَ‌ ‌الْاستعمارِ‌ ‌والْاستعبادِ..‌ ‌وقيودِ‌ ‌الْقبائلِ،‌ ‌وجنازيرِ‌ ‌المْشانقِ..‌ ‌وكلِّ‌ ‌الْقوانينِ‌ ‌الّتي‌ ‌تمارسُ‌ ‌خنقَ‌ ‌الْعصافيرِ..‌ ‌


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